जीवन जीने का डर

Published with the permission of the Author-

माँ की गोद से उतरते वक्त
ज़मीन के खिसक जाने का डर लगता है ।

पापा की उंगली को छोड़ते वक्त
भीड़ मे भटक जाने का डर लगता है ।

दोस्तों से बिछड़ते वक्त
आँसूंओ के उभर पड़ने का डर लगता है ।

प्यार का इज़हार करते वक्त
होंठो के काँप जाने का डर लगता है ।

काम्याबी को हासिल करते वक्त
अपनों से बिछड़ जाने का डर लगता है ।

ईमानदारी से जीवन जीते वक्त
कदमों के बहक जाने का डर लगता है ।

मौत की गोद मे लौटते वक्त
पुनर्जन्म के अभिषाप का डर लगता है ।

Written© by: Srinivas Rao

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